पता नहीं मैं किस दिशा बढ़ रही हूं
मेरी रफ़्तार मेरी नजर को धुंधला रही है
मै आगे बड़ना तो चाहती हूं बहुत
लेकिन लगता है कि पैरो तले जमीन
कुछ मात्रा से खिसकती हुई जा रही है।
सोचा था कि कुछ कदम आगे बढ़ने से
सुख और शांति का एहसास होगा
फिर अवसर से हर क्षण का स्वाद लेंगे
पर साथ में वक़्त बिताने वाले साथी
कहीं मेरे भागते हुए राहों में ही छूट गए।
अब मुझे कुछ नहीं दिखता है आगे
अभी भी अंधेरा है और आगे भी होगा
पर गजब की बात है कि मै खफा नहीं हूं
न कोई ग़म है न किसी से शिकवे
मुझे लगता है मैं जैसे भी हूं ठीक ही हूं ।


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