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| Photo by Sharon McCutcheon from Pexels |
आज भी
उमंगें जो बचपन में उठती थी ,
उड़ती थी रंगीन तितलियों की जैसी,
वह खिलखिलाती मुस्कुराती जैसी,
हसरते आज भी हैं इस दिल में बाकी।
अभी भी मन करता है की दौड़ लगाए,
हवा के साथ कहीं हम भी बह जाए,
कल का रुख किसने देखा है दोस्त,
सपनो की नगरी में ही अब वक़्त समां जाए।
गैर बिजली अँधेरे में आज भी,
जल जाती है मस्ती की हर एक बत्ती,
बतियाने को क्या नहीं है बाकी,
सभी में है बचपन कहीं तो जागी।
और जब गिरता है आसमान से पानी,
कौन नहीं होता उसकी आगोश में दीवानी,
सवालों की लाडे ख़तम नहीं होती,
आज भी है वही कशिश जीने की।
तमन्ना है की हमेशा यह एहसास रहे,
और जहाँ दिल वहां जहाँ रहे,
चाल चंचल हो, उडाता जाये, बेहता चले,
कोई देखे तो उसकी आँखे हमे देख चमका जाए।


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